वाह रे मेरे शेरों! क्या दिखलायी तुमने मर्दांगी,
बिछा दी मासूमों की लाशें, पर करना ना शर्मिंदगी|
ये तो बस देश के भविष्य थें, जी कर भी क्या कर लेते,
डॉक्टर, इंजीनियर भले बन जाते , पर खुदा के काम क्या आते?
फिर कर दिया तुमने साबित की कलम से ताकतवर तलवार है,
कोसे है खुद को वो माँ, जिसने लाड़ले को कहकर भेजा- "बेटा, चला जा, आज मंगलवार है|"
बहाई तुमने खून की नदियां, बिछा दी बचपन की लाश,
नन्हे के सीने को छलनी करता रहा तू, जब तक चली उसकी साँस|
बैठी है वो माँ चौखट पर, राह पर टकटकी लगाये,
इसी आँस में डूबी हुई की कभी तो बेटा लौट के आये|
वाह रे मेरे शेरों! तुम ही हो जन्नत के असली बाशिंदे,
मजहब के रक्षक, अल्लाह के बंदे!
तुमने किया यह काम तो नेक,
पर सवाल हैं मेरे मन में कौंधे अनेक-
पुछू हूँ खुद से वह खुदा भी क्या खुदा होगा,
इन मासूमों के खून के छींटो से जो सना होगा |
सोंचती हूँ खुद में कि उन माओं के आंसुओ के अँगार,
क्या जला नहीं डालेंगे तेरी आत्मा को कर के तार-तार |
जानती हूँ मैं भी कि एक दिन यह भी होगा,
जब उसी खुनी रास्ते पर चलता तेरा भी बच्चा होगा!
फिर भी बेवजह लिखती जा रही हूँ ,
यही सोंचकर कि तुममे से कोई तो, अब भी बचा-खुचा इंसान होगा |

बिछा दी मासूमों की लाशें, पर करना ना शर्मिंदगी|
ये तो बस देश के भविष्य थें, जी कर भी क्या कर लेते,
डॉक्टर, इंजीनियर भले बन जाते , पर खुदा के काम क्या आते?
फिर कर दिया तुमने साबित की कलम से ताकतवर तलवार है,
कोसे है खुद को वो माँ, जिसने लाड़ले को कहकर भेजा- "बेटा, चला जा, आज मंगलवार है|"
बहाई तुमने खून की नदियां, बिछा दी बचपन की लाश,
नन्हे के सीने को छलनी करता रहा तू, जब तक चली उसकी साँस|
बैठी है वो माँ चौखट पर, राह पर टकटकी लगाये,
इसी आँस में डूबी हुई की कभी तो बेटा लौट के आये|
वाह रे मेरे शेरों! तुम ही हो जन्नत के असली बाशिंदे,
मजहब के रक्षक, अल्लाह के बंदे!
तुमने किया यह काम तो नेक,
पर सवाल हैं मेरे मन में कौंधे अनेक-
पुछू हूँ खुद से वह खुदा भी क्या खुदा होगा,
इन मासूमों के खून के छींटो से जो सना होगा |
सोंचती हूँ खुद में कि उन माओं के आंसुओ के अँगार,
क्या जला नहीं डालेंगे तेरी आत्मा को कर के तार-तार |
जानती हूँ मैं भी कि एक दिन यह भी होगा,
जब उसी खुनी रास्ते पर चलता तेरा भी बच्चा होगा!
फिर भी बेवजह लिखती जा रही हूँ ,
यही सोंचकर कि तुममे से कोई तो, अब भी बचा-खुचा इंसान होगा |


